शनिदेव और हनुमान जी की कथा

  शनिदेव और हनुमान जी की कथा बहुत समय पहले, जब रावण का अत्याचार बढ़ रहा था, तब सभी ग्रहों को उसने कैद कर रखा था। ग्रहों को अपने वश में रखकर वह खुद को अजेय समझता था। उन ग्रहों में शनिदेव भी शामिल थे। ⭐ 1. रावण के बंधन में शनिदेव रावण ने शनिदेव को जेल में बाँधकर रखा था ताकि उनकी दृष्टि उसके जीवन में न पड़े और उसे किसी प्रकार का विनाश न हो। परंतु शनिदेव मन ही मन प्रार्थना कर रहे थे कि कोई उन्हें मुक्त करे। ⭐ 2. हनुमान जी का अशोक वाटिका पहुँचना जब हनुमान जी सीता माता की खोज में लंका पहुँचे, तो उन्होंने रावण के द्वारा बंदी बनाए देवताओं और ग्रहों को देखा। उनकी करुणा जाग उठी और उन्होंने सभी को मुक्त करने का संकल्प किया। ⭐ 3. हनुमान जी द्वारा शनिदेव को मुक्त करना हनुमान जी ने अपने बल से रावण की बेड़ियों को तोड़ा और सभी ग्रहों को आजादी दी। शनिदेव उनके सामने आए और बोले: “हे पवनसुत! तुमने मुझे रावण के अत्याचार से मुक्त किया है। मैं तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूलूँगा।” ⭐ 4. शनिदेव का हनुमान जी को वचन शनिदेव ने हनुमान जी को आशीर्वाद देते हुए कहा: “हे हनुमान! जो भी तुम्हारा भक्त होगा,...

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kuch to hai

  *यदि कोई व्यक्ति, किसी दूसरे व्यक्ति को मित्र बना कर उस से लाभ ले रहा हो, तो समझ लेना चाहिए, कि लाभ लेने वाला अपने उत्तम व्यवहार के कारण उससे लाभ ले रहा है, न कि सगा संबंधी होने के कारण।*
      आपने कई बार ऐसा सुना होगा कि *यह मेरा मित्र है। इतना अच्छा मित्र है, सगे भाई से भी बढ़कर।* इस वाक्य का यह अभिप्राय है, कि *यह व्यक्ति मुझे सगे भाई से भी अधिक सहयोग देता है।*
        सगा भाई भी सहयोग देता है। वह तो स्वभाव से ही देता है। हम भाई को सहयोग देते हैं। भाई हमें सहयोग देता है। दोनों एक दूसरे को सहयोग देते है। हम दोनों खून का रिश्ता मानते हैं, इसलिए सहयोग देते हैं। यह तो स्वाभाविक है। परंतु कोई दूसरा व्यक्ति, जो हमारा भाई नहीं है, चाचा नहीं है, मामा नहीं है। उससे हमारा खून का कोई रिश्ता नहीं है, फिर भी यदि वह हमको बहुत अधिक सहयोग देता है। तो प्रश्न उठता है कि वह हमें सहयोग क्यों देता है? *जबकि हमारा उससे कोई खून का रिश्ता भी नहीं है। फिर भी यदि कोई हमें सहयोग दे रहा है, तो इसका अर्थ निश्चित रूप से यह समझना चाहिए कि *वह एक अच्छा व्यक्ति है, बुद्धिमान है, हमारे उत्तम व्यवहार से वह प्रभावित है। उसके साथ हमारे गुण कर्म स्वभाव मेल खाते हैं। इसलिये खून का रिश्ता न होते हुए भी वह हमें सहयोग देता है।*
        जो व्यक्ति हमारे उत्तम गुण कर्म स्वभाव से प्रभावित नहीं है, हमें अच्छा नहीं मानता, जिसके साथ हमारे विचार एवं गुण कर्म स्वभाव नहीं मिलते, वह व्यक्ति हमें सहयोग नहीं देता। यहां तक कि अपने सगे रिश्तेदार भी विचार एवं गुण कर्म स्वभाव न मिलने पर सहयोग नहीं देते।
              अनेक बार तो ऐसा भी होता है, कि अपने खून के रिश्तेदार लोग, सहयोग देना तो दूर, बल्कि विरोध करते हैं। मारपीट करते हैं। यहां तक कि कभी-कभी तो गोली मारकर हत्या तक कर देते हैं। वही लोग जो हमारे खून के रिश्तेदार थे, उन्होंने हमारे साथ ऐसा दुर्व्यवहार क्यों किया? कारण वही है कि उनके साथ हमारे विचार और गुण कर्म स्वभाव का तालमेल नहीं बना।
          इसलिए सार यह हुआ कि आप किसी भी अच्छे बुद्धिमान धार्मिक सदाचारी व्यक्ति के साथ, यदि अपना व्यवहार उत्तम रखें, आपके गुण कर्म  स्वभाव और विचार भी यदि उसके साथ मेल खा जाएँ, तो आप किसी भी अच्छे व्यक्ति से भरपूर सहयोग ले सकते हैं। इसके लिए कोई खून की रिश्तेदारी होना आवश्यक नहीं है। इस बात के उदाहरण आपको अपने आसपास बहुत से मिल जाएंगे। आपने ऐसे मित्र सहयोगी, अपने जीवन में कुछ न कुछ जरूर देखें होंगे।
     यदि इतिहास की बात करें, तो श्रीराम जी ने सुग्रीव को सहयोग दिया। सुग्रीव ने श्रीराम जी को सहयोग दिया। उनके विचार एवं गुण कर्म स्वभाव मेल खाते थे। इसलिए दोनों ने एक दूसरे को सहयोग दिया।
      *तो इसी सिद्धांत पर आप भी अपने जीवन को चलाइए। अपना व्यवहार उत्तम बनाइए। अपने विचार तथा गुण कर्म स्वभाव को, अच्छे लोगों के साथ मिलाइए। दुष्ट लोगों से दूर रहिए। आप बहुत आनंद से जिएंगे*
    -- *स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक।*

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