शनिदेव और हनुमान जी की कथा

  शनिदेव और हनुमान जी की कथा बहुत समय पहले, जब रावण का अत्याचार बढ़ रहा था, तब सभी ग्रहों को उसने कैद कर रखा था। ग्रहों को अपने वश में रखकर वह खुद को अजेय समझता था। उन ग्रहों में शनिदेव भी शामिल थे। ⭐ 1. रावण के बंधन में शनिदेव रावण ने शनिदेव को जेल में बाँधकर रखा था ताकि उनकी दृष्टि उसके जीवन में न पड़े और उसे किसी प्रकार का विनाश न हो। परंतु शनिदेव मन ही मन प्रार्थना कर रहे थे कि कोई उन्हें मुक्त करे। ⭐ 2. हनुमान जी का अशोक वाटिका पहुँचना जब हनुमान जी सीता माता की खोज में लंका पहुँचे, तो उन्होंने रावण के द्वारा बंदी बनाए देवताओं और ग्रहों को देखा। उनकी करुणा जाग उठी और उन्होंने सभी को मुक्त करने का संकल्प किया। ⭐ 3. हनुमान जी द्वारा शनिदेव को मुक्त करना हनुमान जी ने अपने बल से रावण की बेड़ियों को तोड़ा और सभी ग्रहों को आजादी दी। शनिदेव उनके सामने आए और बोले: “हे पवनसुत! तुमने मुझे रावण के अत्याचार से मुक्त किया है। मैं तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूलूँगा।” ⭐ 4. शनिदेव का हनुमान जी को वचन शनिदेव ने हनुमान जी को आशीर्वाद देते हुए कहा: “हे हनुमान! जो भी तुम्हारा भक्त होगा,...

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जगतगुरु स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज का जन्मोत्सव: भारतीय अध्यात्म का एक उज्ज्वल पर्व

 जगतगुरु स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज का जन्मोत्सव: भारतीय अध्यात्म का एक उज्ज्वल पर्व


भारत भूमि संतों, महात्माओं और ऋषियों की भूमि है, जिन्होंने अपनी आध्यात्मिक साधना और ज्ञान के माध्यम से मानवता को मार्गदर्शन प्रदान किया। ऐसे ही एक महान संत, जगतगुरु स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज, भारतीय वेदांत और सनातन धर्म के एक प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उनका जन्मोत्सव हर साल श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

जीवन परिचय

स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी का जन्म 21 दिसंबर 1868 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) के पास एक छोटे से गाँव में हुआ। उनका बचपन का नाम राजाराम था। बाल्यकाल से ही वे साधारण जीवन और आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित थे। मात्र नौ वर्ष की आयु में उन्होंने घर-परिवार छोड़कर सन्यास की राह पकड़ ली।

स्वामी जी ने अपने जीवन में अद्वितीय साधना और तपस्या के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त की। वे वेद, उपनिषद, गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथों के ज्ञाता थे। 1941 में उन्हें ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में नियुक्त किया गया। उनकी अध्यात्मिक नेतृत्व क्षमता ने उन्हें जगतगुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया।

स्वामी जी की शिक्षाएँ

स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने वेदों के प्रचार-प्रसार और सनातन धर्म की परंपराओं को पुनर्जीवित करने का कार्य किया। उनकी शिक्षाएँ मानवता, सेवा और सत्य पर आधारित थीं। वे कहते थे कि व्यक्ति को अपने धर्म और कर्तव्यों का पालन करते हुए आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना चाहिए।

उन्होंने जीवन में साधना, ध्यान और भक्ति को प्राथमिकता देने पर बल दिया। उनका मानना था कि ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग सरल और सहज है, बशर्ते व्यक्ति अपने भीतर की आध्यात्मिक शक्ति को जागृत करे।

जन्मोत्सव का महत्व

स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज का जन्मोत्सव न केवल उनके अनुयायियों के लिए, बल्कि समस्त मानवता के लिए एक प्रेरणा है। इस अवसर पर उनके जीवन और शिक्षाओं को याद किया जाता है। आश्रमों और मंदिरों में भक्ति संगीत, यज्ञ, सत्संग और प्रवचनों का आयोजन होता है।

जन्मोत्सव का यह पावन पर्व हमें यह सिखाता है कि हम अपने जीवन में सत्य, धर्म और सेवा के पथ पर चलें। स्वामी जी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति और साधना से व्यक्ति न केवल स्वयं को उन्नत कर सकता है, बल्कि समाज को भी आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बना सकता है।

उपसंहार

जगतगुरु स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज का जीवन और उनकी शिक्षाएँ आज भी मानवता के लिए एक प्रकाशस्तंभ के रूप में कार्य कर रही हैं। उनका जन्मोत्सव केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जागरण का पर्व है। उनके दिखाए मार्ग पर चलकर हम अपने जीवन को सार्थक और समाज को एक बेहतर दिशा प्रदान कर सकते हैं।

“धर्म, सेवा और साधना का यह संदेश हमें सदैव प्रेरित करता रहेगा।”


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